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Names of Speakers

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रचना यादव

रचना यादव एक ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि से आती हैं जहाँ भारतीय संस्कृति के मूल्यों को हमेशा बढ़ावा दिया जाता रहा है। वे भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली से जन संचार में स्नातकोत्तर हैं और संस्थान का ‘सिल्वर साल्वर अवार्ड’ भी प्राप्त कर चुकी हैं। इसके अलावा उन्होंने प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद से कत्थक में ‘प्रभाकर’ का प्रशिक्षण प्राप्त किया है। रवि जैन के निर्देशन में उन्होंने नृत्याभ्यास शुरू किया और बाद में दृष्टिकोण डांस फाउंडेशन, अदिति मंगलदास डांस कंपनी से जुड़कर अपना प्रशिक्षण जारी रखा। आगे चलकर पं. जयकिशन महाराज के निर्देशन में नृत्य में उच्चतर प्रशिक्षण जारी रखा। रचना यादव ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई सांस्कृतिक समारोहों में शिरकत की है और भारत के कई शहरों में एकल नृत्य प्रस्तुति भी दी है। वे अपनी संस्था ‘रचना यादव कत्थक स्टूडियो’ के माध्यम से 60 छात्रों को प्रशिक्षण देती हैं और ‘हम कदम’ नाम से एक वार्षिक आयोजन भी करती हैं जिसमें नयी प्रतिभाओं को एक मंच प्रदान किया जाता है।

सुकृता पॉल कुमार

सुकृता पॉल कुमार ने लगभग चार दशकों से स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं में अंग्रेज़ी-अमेरिकन साहित्य और अनुवाद के माध्यम से भारतीय साहित्य का अध्यापन किया है। उन्हें अब तक लगभग पन्द्रह फ़ेलोशिप मिल चुके हैं जिनमें भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (शिमला) के फ़ेलोशिप के अलावा टोरंटो, कैंब्रिज, लन्दन, लोवा, कैलिफोर्निया और हांगकांग के विश्वविद्यालयों में व्याख्यान और प्रस्तुति के लिए प्रतिष्ठित सम्मान और फ़ेलोशिप सम्मान शामिल हैं। वर्ष 2012 में भारत सरकार के संस्कृति मन्त्रालय द्वारा भारत की सांस्कृतिक विविधता से सम्बन्धित एक पुस्तक परियोजना के लिए उन्हें टैगोर फ़ेलोशिप प्रदान किया गया है। ‘मैन, वुमन एंड एंड्रोग्यनी,’ ‘कनवरशेसंस ऑन मॉडर्निज़्म,’ ‘नैरेटिंग पार्टीशन’ (आलोचना); ‘मैपिंग मेमोरीज,’ ‘इस्मत : हर लाइफ, हर टाइम्स,’ ‘द डाइंग सन’ (सम्पादन) और ‘फोल्ड्स ऑफ साइलेंस,’ ‘विदाउट मार्जिन्स,’ ‘रोइंग टूगेदर,’ ‘सेवेन लीव्स : वन ऑटम’ (कविता संग्रह) उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। सुकृता पॉल कुमार इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में अरुणा आसफ अली चेयर और विश्वविद्यालय के क्लस्टर इन्नोवेशन सेंटर में पाठ्यक्रम समन्वयक हैं।

रक्षंदा जलील

रक्षंदा जलील ने दिल्ली पब्लिक स्कूल से पढ़ाई करने के बाद मिरांडा हाउस (दिल्ली विश्वविद्यालय) से अग्रेज़ी साहित्य में स्नातक किया है। उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के थर्ड वर्ल्ड स्टडीज से ‘प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट एज रिफ्लेक्टेड इन उर्दू लिटरेचर’ विषय पर डॉक्टोरेट की उपाधि प्राप्त की है। एक ख्याति प्राप्त आलोचक और साहित्य-इतिहासकार के रूप में रक्षंदा जलील के अब तक दो सम्पादित कहानी-संकलन, दिल्ली के अल्पज्ञात स्मारकों पर एक निबन्ध पुस्तक, एक स्त्रीवादी रचनाकार की जीवनी और अनुवाद पर आठ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। वे हिन्दी-उर्दू साहित्य और संस्कृति को लोकप्रिय बनाने के लिए ‘हिन्दुस्तानी आवाज़’ नाम की संस्था और दो ब्लॉगों का भी संचालन करती हैं।

सैफ़ महमूद

सैफ़ महमूद दिल्ली में रहते हैं और पेशे से वकील हैं। वे एक साहित्य मर्मज्ञ, उद्घोषक और अनुवादक तो ही हैं, मानवाधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले एक सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं। वे साउथ एशियन अलाइंस फॉर लिटरेचर, आर्ट एंड कल्चर (SAALARC) के संस्थापक हैं। उर्दू में उपलब्ध उनके विपुल लेखन के अंग्रेज़ी अनुवाद हो चुके हैं जिन्हें विभिन्न प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित भी किया गया है। पूर्व में उन्होंने अपने पिता ताहिर महमूद के उर्दू तहरीर ‘दिल की हिकायतें’ नामक एक संकलन का सम्पादन किया है।

निष्ठा गौतम

निष्ठा गौतम दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ाती हैं और एशिया की विख्यात विचार मंडली ‘आब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन’ से सम्बद्ध हैं। संस्कृति, जेंडर और सैन्य विषयों से सम्बन्धित उनके लेख ‘वाल स्ट्रीट जर्नल,’ ‘डेली मेल,’ ‘द कैरवान,’ ‘इंडिया टुडे,’ ‘हिन्दुस्तान टाइम्स,’ ‘द पायनियर’ और ‘डीएनए’ जैसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होते रहते हैं। टेलीविजन और रेडियो के प्रमुख कार्यक्रमों में भी वे एक विशेषज्ञ के रूप में लगातार हिस्सा लेती रहती हैं।

नीलिमा चौहान

नीलिमा पेशे से शिक्षिका हैं और फ़िलवक़्त दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सान्ध्य) में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। वे एक माँ, बेटी, पत्नी, दोस्त और लेखिका जैसी बेहद व्यवस्थित भूमिकाओं में भी हैं। गुत्थी ये है कि वे बोहेमियन, हिप्पी, बाइक गैंग की सरगना, स्लट-नेत्री क्यों नहीं हैं। दरअसल वे ख़ुद को अन्तर्मन की खोजी ज़्यादा मानती हैं। शब्द और चुप्पी की स्त्री-भाषा में जो कुछ अनकहा रह जाता है उसे ताड़ना और कह देना अपना असली काम समझती हैं। बाग़ी प्रेम-विवाहों के आख्यानों के सम्पादित संकलन के बाद वाणी प्रकाशन से प्रकाशित उनकी किताब ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ इन दिनों काफी चर्चित हो रही है।

विनीत बंसल

विनीत बंसल ने औपचारिक रूप से लिखना नहीं सीखा, पर यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों में छात्रों को लेखन-कला की शिक्षा देते हैं। अब तक अंग्रेज़ी में 7 और हिन्दी में 2 किताबें लिख चुके हैं। 2 किताबों पर काम जारी है। महाबली खली के साथ मिलकर उनकी जीवनी लिख चुके हैं। और भी कई नामचीन हस्तियों के साथ काम कर रहे हैं और जल्दी ही टी.वी. स्क्रिप्ट लेखन में हाथ आजमाने आ रहे हैं। यूँ तो विनीत बंसल भारतीय स्टेट बैंक में अधिकारी हैं पर इतना लिखने और पढ़ने का समय कहाँ से निकालते हैं, पूछने पर कहते हैं कि ‘सपनों में’। कहते हैं कि मैं सपने बहुत देखता हूँ, कल्पनाएँ बहुत करता हूँ और अपने आप से ज्यादा आप में रहता हूँ। वे किताबों को समाज और व्यक्तित्व का आईना मानते हैं और इसी कारण वे अपनी सोच को शब्दों की माला में पिरोकर किताबों के माध्यम से ज़िंदगी में प्यार और रिश्तों की अहमियत को संजीदगी से पेश करते हैं।

अविनाश मिश्र

अविनाश मिश्र एक युवा कवि और आलोचक के रूप में तेजी से अपनी पहचान बना रहे हैं। हिन्दी के प्रतिष्ठित प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक प्रकाशन माध्यमों पर उनकी रचनाएँ प्रकाशित और चर्चित हुई हैं। यदि उन्हीं के शब्दों में कहें तो अब तक ‘न कोई किताब’ प्रकाशित हुई है और ‘न कोई पुरस्कार’ ही मिला है। साहित्यिक पत्रिका ‘पाखी’ के सम्पादन से जुड़े रहे हैं और इस समय ‘दी लल्लनटॉप’ की टीम में शामिल हैं।

प्रतीक्षा पांडे

प्रतीक्षा पांडे का परिचय ख़ास उन्हीं के अंदाज़ में कुछ यों है : “सिमिट्री डिसऑर्डर है। चिप्स का पैकेट गलत तरीके से फाड़ दो तो बुरे गाने सुनाकर ‘डिवाइन रिवेंज’ लेती है। कॉन्वेंट से पढ़ी है और कनपुरिया है। जन्नेटर जैसी हँसी। टीम की इंगलिस पिचर है। जब भी बड़ी होगी तो कवियत्री बनेगी। सुअर की आवाज निकालती है क्यूट फेस बनाकर। एक हाथ पर कौआ और दूजे पर मछली बनवा रखी है। थोड़ी सिलबिल्ली हैं और पूरी ठस। लड़कियों को लेकर कोई हलकी बात कहे तो मौके पर ही पेल देती हैं। स्कार्फ और सर्फिंग, दोनों से प्यार है।”

अभय कुमार दुबे

अभय कुमार दुबे विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) में फेलो और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक हैं और पिछले दस वर्षों से हिन्दी-रचनाशीलता और आधुनिक विचारों की अन्योन्यक्रिया का अध्ययन कर रहे हैं। साहित्यिक रचनाओं के समाजवैज्ञानिक अध्ययन और मूल्यांकन में उनकी गहरी रुचि है। समाज-विज्ञान को हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में लाने की व्यापक परियोजना के तहत इन्होंने अब तक पन्द्रह ग्रन्थों का लेखन एवं सम्पादन किया है। कई विख्यात विद्वानों की रचनाओं के अनुवाद भी किए हैं। समाज-विज्ञान और मानविकी की पूर्व-समीक्षित पत्रिका ‘प्रतिमान : समय समाज संस्कृति’ के प्रधान सम्पादक हैं। पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन और टीवी चैनलों पर होने वाली चर्चाओं में नियमित भागीदारी करते हैं।

राहुल देव

राहुल देव CNEB न्यूज चैनल के प्रधान सम्पादक और सी ई ओ हैं। उन्हें जनसत्ता, आजतक, जी न्यूज, दूरदर्शन तथा जनमत न्यूज जैसे प्रतिष्ठित समाचार माध्यमों में वरिष्ठ पदों पर काम करने का लगभग चार दशकों का लम्बा अनुभव प्राप्त है। वे मंगलायत विश्वविद्यालय के पत्रकारिता और जन संचार विभाग से एक फैकल्टी के रूप में भी जुड़े हैं। अकादमिक जगत के अपने अन्य सहयोगियों के साथ राहुल देव का भी यह विश्वास है कि वे अपने सुदीर्घ अनुभवों के आधार पर अकादमिक क्षेत्र में व्याप्त व्यवहारिक समस्याओं को दूर कर इस क्षेत्र को और भी समृद्ध बना सकते हैं।

आदित्य निगम

आदित्य निगम सामाजिक और राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में काम करने वाले लेखक-बुद्धिजीवी हैं। भारत के समकालीन राजनीतिक अनुभवों और गैर-पश्चिमी देशों में पूँजी के वैकल्पिक इतिहास के अध्ययन पर फोकस करते हुए वे पूँजी और लोकतन्त्र के मार्क्सवादी विवेचन के आलोक में संविधान की आर्थिक-राजनीतिक संरचनाओं का अध्ययन कर रहे हैं। सीएसडीएस के सहयोगियों के साथ मिलकर उन्होंने भारतीय भाषाओं की अवधारणा पर उल्लेखनीय कार्य किया है। वे इस सेंटर के भारतीय भाषा कार्यक्रम और ‘प्रतिमान’ पत्रिका से जुड़े हैं तथा काफिला डॉट ओआरजी पर लगातार राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणियाँ लिखते हैं। इसके अलावा वे ‘पोस्ट नेशन कंडीशन’ की अवधारणा पर काम करने वाले भारत, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे दक्षिण एशियाई देशों के विद्वानों से भी जुड़े रहे हैं। ‘इन्सरेक्शन ऑफ लिटिल सेल्व्स,’ ‘पॉवर एंड कॉन्टेस्टेशन’ (निवेदिता मेनन के साथ), ‘आफ्टर यूटोपिया’ तथा ‘डिजायर नेम्ड डेवलपमेंट’ उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं।

प्रतिष्ठा सिंह

प्रतिष्ठा सिंह ने कुछ समय तक लोकसभा सचिवालय में इन्टर्नशिप की है और इटैलियन भाषा में अध्ययन और शोध कार्य किया है। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में यू. टी. ए. रह चुकी हैं और वहाँ इटैलियन पढ़ाती भी हैं। लेखन में और देश-दुनिया के भ्रमण में खूब रुचि है और जब कभी समय मिलता है, कविताएँ और कहानियाँ लिखती हैं। वाणी प्रकाशन से हाल ही में आई उनकी पुस्तक ‘वोटर माता की जय!’ इन दिनों बहुत तेजी से चर्चित हो रही है। यह पुस्तक बिहार के चुनाव में महिलाओं की भागीदारी का प्रामाणिक दस्तावेज़ प्रस्तुत करती है।

यतीन्द्र मिश्र

यतीन्द्र मिश्र हिन्दी के युवा कवि, सम्पादक, संगीत और सिनेमा अध्येता के रूप में चर्चित हैं। अब तक उनके चार कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा इन्होंने शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी, नृत्यांगना सोनल मानसिंह और शहनाई उस्ताद बिस्मिल्ला खां के जीवन और कला पर भी क्रमशः ‘गिरिजा’, ‘देवप्रिया’ और ‘सुर की बारादरी’ जैसी पुस्तकों का लेखन किया है। प्रदर्शनकारी कलाओं पर ‘विस्मय का बखान’, कन्नड़ शैव कवयित्री अक्क महादेवी के वचनों का हिन्दी में पुनर्लेखन ‘भैरवी’, हिन्दी सिनेमा के सौ वर्षों के संगीत पर आधारित ‘हमसफ़र’ के अतिरिक्त फिल्म निर्देशक एवं गीतकार गुलज़ार की कविताओं एवं गीतों के चयन क्रमशः ‘यार जुलाहे’ तथा ‘मीलों के दिन’ नाम से सम्पादित हैं। यतीन्द्र मिश्र को अब तक भारतीय ज्ञानपीठ फैलोशिप, रज़ा सम्मान, भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद् युवा पुरस्कार, हेमन्त स्मृति कविता सम्मान सहित भारत सरकार के संस्कृति मन्त्रालय की कनिष्ठ शोधवृत्ति एवं सराय, नयी दिल्ली की स्वतन्त्र शोधवृत्ति भी मिली हैं। वाणी प्रकाशन से हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘लता : सुर गाथा’ के लिए उन्हें दैनिक भास्कर का द्वारका प्रसाद अग्रवाल सम्मान मिल चुका है और महाराणा मेवाड़ सम्मान की घोषणा की गयी है।

विद्या सिन्हा

विद्या सिन्हा का जन्म छपरा (बिहार) में हुआ और इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। वे पिछले 15 वर्षों से लोक साहित्य के अध्ययन और लोकगीतों के संग्रह कार्य में संलग्न हैं और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन कर रही हैं। ‘स्वातंत्र्योत्तर कहानी का परिदृश्य और फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियाँ,’ ‘आधुनिक परिदृश्य : आंचलिकता और हिन्दी उपन्यास,’ ‘भारतीय लोक साहित्य : परम्परा और परिदृश्य’ तथा ‘हिन्दी लोक साहित्य : परम्परा और परख’ उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। ‘निराला, अज्ञेय और मुक्तिबोध’ नाम से एक पुस्तक का सम्पादन भी किया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मेजर प्रोजेक्ट के तहत उन्होंने ‘संस्कारेतर लोकगीतों में कथा तत्त्व और सामाजिक संरचना के सूत्र’ पर शोध किया है। इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल महाविद्यालय में अध्यापन कर रही हैं।

प्रो. कृष्ण कुमार

कृष्ण कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग में ख्यातिप्राप्त प्रोफेसर रहे हैं। समाजशास्त्र के प्रमुख विषयों और शिक्षा के इतिहास-वर्तमान पर अपने विचारोत्तेजक लेखन के लिए चर्चित प्रो. कृष्ण कुमार ने विद्यालय पाठ्यक्रम को एक सामाजिक पड़ताल के रूप में विकसित करने का महत्त्वपूर्ण काम किया है। शिक्षा की शिक्षण प्रक्रिया को उन्होंने एक औपनिवेशिक समाज में आधुनिकता के साथ आलोचनात्मक संवाद के रूप में देखने की पेशकश की है। एक शिक्षक और प्रतिभाशाली लेखक के तौर पर उन्होंने शिक्षा और ज्ञान का एक ऐसा सौन्दर्यशास्त्र विकसित किया है जो इस क्षेत्र में व्याप्त उद्विग्नता और हिंसा को शान्त कर सके। अकादमिक लेखन के अलावा उन्होंने कहानियाँ और निबन्ध भी लिखे हैं तथा 2004 से लेकर 2010 तक लगातार बच्चों के लिए गुणात्मक लेखन किया है। उन्होंने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद् (NCERT) के निदेशक के रूप में विद्यालयी पाठ्यक्रम में बुनियादी सुधार की दिशा में बेहद सराहनीय कार्य किया है।

अपूर्वानंद

अपूर्वानंद हिन्दी के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं लेकिन अध्यापक के अलावा एक सजग बुद्धिजीवी के रूप में भी वे विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर लगातार लिखते-बोलते रहे हैं। हिन्दी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनके अनेक लेख और समीक्षाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने ‘धारा,’ ‘कसौटी’ (सह-सम्पादन) और ‘आलोचना’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का सम्पादन किया है। अबतक आलोचना की उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं—मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र पर केन्द्रित ‘सुन्दर का स्वप्न’ और ‘साहित्य का एकांत’। महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा से सम्बद्ध रहने के बाद आजकल वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन करते हैं।

हर्षबाला शर्मा

हर्षबाला शर्मा एक बेहद सजग अध्यापिका, वक्ता और विदुषी हैं। उन्होंने भाषा की औपनिवेशिक मानसिकता और इक्कीसवीं सदी में भाषा के प्रश्नों पर महत्त्वपूर्ण कार्य किया है और ‘समाज-मनो भाषा विज्ञान’ पर मेजर रिसर्च प्रोजेक्ट पूरा किया है। वे कहानियाँ भी लिखती हैं। ‘एक बदचलन गाना,’ ‘तवायफ,’ ‘कृष्णा मेनन उर्फ़ कथकली’ और ‘बिछिया’ जैसी कहानियाँ लमही, तहलका, समीक्षा, जनकृति, हिन्दी कुञ्ज आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। भाषा के दर्शन और भाषिक दर्शन के अलावा अनुवाद कार्य में उनकी विशेष रुचि है। भाषा और भारतीय साहित्य पर अब तक 3 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने लौजैन विश्वविद्यालय, स्विट्जरलैंड में विजिटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में कार्य किया है। हर्षबाला शर्मा को विशिष्ट शिक्षक सम्मान (2009) से सम्मानित किया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए आगामी 4 मार्च 2017 को उन्हें वीनस अंतर्राष्ट्रीय स्त्री संघ (चेन्नई) द्वारा सम्मानित किया जा रहा है। वर्तमान में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के अत्यन्त प्रतिष्ठित इन्द्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय में अध्यापन के साथ-साथ निरन्तर लेखन कर रही हैं।

अपराजिता शर्मा

अपराजिता शर्मा तेजी से उभरती हुई इलस्ट्रेटर हैं। उन्होंने आधुनिक तकनीक की दुनिया में हिन्दी की एक बड़ी कमी को पूरा करते हुए 'हिमोजी' (हिन्दी इमोजी) की रचना की है। उन्होंने देवनागरी हिन्दी की पहली चैट स्टिकर एप ‘हिमोजी’ तैयार किया है, जो अपने लॉन्च के ठीक बाद से ही वर्चुअल दुनिया, सभी नैशनल न्यूज़ चैनल्स, समाचार-पत्र, रेडियो स्टेशन तथा छोटी-बड़ी साहित्यिक, ग़ैर साहित्यिक पत्रिकाओं में लगातार चर्चा में रहा है। अब तक ‘हिमोजी’ के चालीस हज़ार से अधिक एप डाउनलोड हो चुके हैं। साल 2016 में ‘हिमोजी’ के ऑफ़िशियल लॉन्च के साथ ही देश-विदेश के प्रमुख मंचों पर आयोजित चर्चाओं में भाग ले चुकी अपराजिता शर्मा नीलिमा चौहान की बेहद चर्चित पुस्तक ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स' के साथ ही बुक इलस्ट्रेशन और कवर डिज़ाइनिंग की दुनिया में दखल दे चुकी हैं। अपराजिता शर्मा वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली के अत्यन्त प्रतिष्ठित वीमेन कॉलेज मिरांडा हाउस में हिंदी की प्राध्यापिका हैं। प्र

श्यौराज सिंह बेचैन

श्यौराज सिंह बेचैन हिन्दी के शीर्षस्थ दलित लेखक और चिन्तक हैं। इन्होंने हिन्दी साहित्य से एम.ए., पीएच.डी और डी.लिट्. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। अबतक इनकी लगभग बीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें ‘मेरा बचपन मेरे कन्धों पर’ (आत्मकथा) सर्वाधिक चर्चित है। ‘तहलका’ पत्रिका में 35 किश्तों में इस कृति का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा पंजाबी, जर्मन, मराठी, उर्दू, मलयालम और कन्नड़ में भी इसके अनुवाद जारी हैं। लेखक के तीन कविता-संग्रह, एक शोध-प्रबन्ध तथा दलित और स्त्री-विमर्श पर कुल 15 (लिखित और सम्पादित) पुस्तकें प्रकाशित हैं। इन्होंने फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम, कनाडा, हॉलैंड और ग्रेट ब्रिटेन की साहित्यिक-सांस्कृतिक यात्राएँ की हैं। साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए इन्हें सुब्रह्मण्यम भारती सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान तथा स्वामी अछूतानन्द अति विशिष्ट सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। ये भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (शिमला) के पूर्व अध्येता रहे हैं और वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।

बजरंग बिहारी तिवारी

बजरंग बिहारी तिवारी का जन्म पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक पारम्परिक किसान परिवार में हुआ। 12वीं तक की शिक्षा गाँव में और उच्च शिक्षा इलाहाबाद और दिल्ली से पूरी हुई। 1992 से 1997 के दौरान उन्हें साक्षरता आन्दोलन में भी भाग लेने का अवसर मिला। बजरंग बिहारी तिवारी ने भारतीय दलित आन्दोलन और साहित्य के गम्भीर अध्येता और विश्लेषक के रूप में अपनी पहचान बनाई है। अब तक हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनके अनेक लेख प्रकाशित हो चुके हैं। 2004 से हिन्दी मासिक ‘कथादेश’ में ‘दलित प्रश्न’ शीर्षक से लगातार स्तम्भ लेखन कर रहे हैं। ‘जाति और जनतन्त्र : दलित उत्पीड़न पर केन्द्रित,’ ‘दलित साहित्य : एक अन्तर्यात्रा,’ ‘भारतीय दलित साहित्य : आंदोलन और चिंतन’ तथा ‘बांग्ला दलित साहित्य : सम्यक अनुशीलन’ इनकी प्रमुख आलोचनात्मक पुस्तकें हैं। इसके अलावा इन्होंने ‘भारतीय साहित्य : एक परिचय’ और ‘यथास्थिति से टकराते हुए’ शृंखला के अंतर्गत दलित स्त्री से जुड़ी कहानियों, कविताओं और आलोचना का सम्पादन/सह-सम्पादन भी किया है। इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबन्धु महाविद्यालय में अध्यापन कर रहे हैं।

अजय नावरिया

दिल्ली के कोटला मुबारकपुर गाँव में जन्मे अजय नावरिया एक गम्भीर प्राध्यापक और जुझारू लेखक हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम.ए. और पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। धर्मशास्त्र और दलित विमर्श उनकी विशेषज्ञता के मुख्य क्षेत्र हैं। उन्होंने ‘हंस’ पत्रिका के दलित विशेषांक (2004) और ‘नैतिकताओं का टकराव’ (2005) में राजेन्द्र यादव के साथ सम्पादन सहयोग किया है और ‘डॉ. उदित राज के लेख’ पुस्तक का स्वतन्त्र सम्पादन किया है। ‘पटकथा और अन्य कहानियाँ’ उनका प्रमुख कहानी संग्रह है। वे एन.सी.ई.आर.टी. की पाठ्यपुस्तक समिति में मानद सदस्य भी हैं। फिलहाल जामिया मिल्लिया इस्लामिया में अध्यापन और स्वतन्त्र लेखन कर रहे हैं।

पुष्पेश पन्त

पुष्पेश पन्त ने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, भारतीय विदेश नीति, संस्कृति, धर्म, यात्रा और भारतीय व्यंजनों पर लगभग 50 पुस्तकों का लेखन किया है। उनकी पुस्तक ‘इंडिया : कुक बुक’ को न्यूयॉर्क टाइम्स की ओर से वर्ष 2010 का बेस्टसेलर घोषित किया गया है। पुष्पेश पन्त अंग्रेज़ी और हिन्दी अखबारों में नियमित स्तम्भ लिखते हैं और रेडियो और टेलीविजन पर लगातार चर्चा-परिचर्चा में भाग लेते रहे हैं। उन्होंने डिस्कवरी और बीबीसी जैसे चैनल के कार्यक्रमों में शिरकत की है एवं मध्य प्रदेश और उत्तर-पूर्वी राज्यों के जनजातीय जीवन पर डॉक्यूमेंट्री का निर्माण भी किया है।

इरा पांडे

इरा पांडे एक ख्याति प्राप्त सम्पादक हैं जो ‘सेमिनार,’ ‘बिब्लियो,’ ‘डॉर्लिंग किन्डर्सले’ और ‘रोली बुक्स’ से जुड़ी रही हैं। इस समय वे आई. आई. सी. के सभी प्रकाशनों की प्रधान सम्पादक हैं। उन्होंने ‘दीदी : माई मदर्स व्याइस’ पुस्तक का लेखन किया है और हाल में ही प्रसिद्ध साहित्यकार शिवानी की कृति ‘अपराधिनी’ का अनुवाद भी किया है।

अनु सिंह चौधरी

अनु सिंह चौधरी लेखन के अलावा पत्रकारिता और डॉक्यूमेंट्री निर्माण के क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। इनका कहानी-संग्रह ‘नीला स्कार्फ’ काफी पसंद किया गया है। इन्होंने परिवार और परवरिश पर केन्द्रित एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘मम्मा की डायरी’ लिखी है जो हिन्दी में अपने तरह की एकमात्र पुस्तक है। झारखण्ड के आदिवासी समुदाय पर आधारित इनकी डॉक्यूमेंट्री ‘लाइटनिंग अप द हिल्स’ काफी चर्चित रही है। अनु सिंह चौधरी को उनके योगदान के लिए ‘रामनाथ गोयनका अवार्ड फॉर एक्सलेंस इन जर्नलिज्म’ और ‘लाडली मीडिया एंड एडवरटाइजिंग अवार्ड’ से सम्मानित किया जा चुका है।

बाबली मोइत्रा सराफ

इन्द्रतप्रस्थ महिला महाविद्यालय की प्राचार्या बाबली मोइत्रा सराफ कॉलेज के अंग्रेज़ी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और मल्टीर मीडिया एवं जनसंचार विभाग की विभागाध्य्क्षा हैं। उन्होंरने अंग्रेज़ी में एम.फिल. और समाज विज्ञान में पीएच.डी की डिग्री प्राप्ता की है। वे बहुभाषाविद हैं और बहुभाषीय अनुवाद में पारंगत हैं। उन्होंने मारिया फेडरिका ओदेरा के साथ महाश्वे्ता देवी की कृतियों का इतालवी अनुवाद किया है। उनकी कृति ‘राजोरी रिमेम्बफर्ड’ (2007) हिंदी, उर्दू और पंजाबी की वाचिक परम्परा और दस्तामवेज़ों का अनुवाद है। डॉ. सराफ ने अनुवाद और निर्वचन अध्यायन पर अनेक लेख प्रकाशित किए हैं। वे ‘ट्रांसलेशन : ए इंटरडिसिप्लिनरी जर्नल’ और ‘सार-संसार’ पत्रिकाओं के संपादक मंडल में भी शामिल हैं। डॉ. मोइत्रा सराफ भारत-इतालवी सांस्कृ तिक आदान-प्रदान कार्यक्रम के अंतर्गत छात्रवृत्तिधारी, फुलब्राइट-नेहरू इंटरनेशल एजुकेशन एडमिनिस्ट्रेनटर प्रोग्राम के अंतर्गत अतिथि विद्वान, NIDA स्कूरल ऑफ ट्रांसलेशन स्टरडीज़ में रिसर्च एसोसिएट और विजिटंग फैकल्टीम रही हैं। उन्हेंत दिल्ली् विश्व्विद्यालय द्वारा विशिष्टस शिक्षक पुरस्कांर, दि एमिटी वीमेन एचीवर इन एजुकेशन अवॉर्ड, 27वें डॉ. एस. राधाकृष्ण न स्मृटति राष्ट्री य पुरस्काार और सेंट स्टी फेंस कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) द्वारा उत्कृंष्टिता के लिए आजीवन प्रयास हेतु डिस्टिंग्विश्डट एलमनस अवॉर्ड से सम्माकनित किया गया है।

मनीषा तनेजा

मनीषा तनेजा दिल्ली विश्वविद्यालय में स्पेनिश की अध्यापिका हैं। इन्होंने एम.ए. और एम. फिल. की शिक्षा प्राप्त की है और अनुवाद अध्ययन में शोध किया है। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों में उनके अनेक शोध लेख प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने पाब्लो नेरूदा की कृति का हिन्दी अनुवाद ‘हाँ मैंने ज़िन्दगी जी है’ नाम से और अन्ना लोंगिनी की कृति का अंग्रेज़ी अनुवाद ‘द सिलहौटे : ऑन द बॉर्डर बिटवीन आर्ट एंड पॉलिटिक्स’ नाम से किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रो. विभा मौर्या के साथ उन्होंने ‘अ व्यू ऑफ द 1857 रिवोल्ट इन स्पेनिश प्रेस’ विषय पर शोध आलेख की प्रस्तुति भी की है।

प्रचण्ड प्रवीर

बिहार के मुंगेर जिले में जन्मे और पले-बढ़े प्रचण्ड प्रवीर ने 2005 में भारतीय प्रौद्यौगिकी संस्थान, दिल्ली से रासायनिक अभियान्त्रिकी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। 2010 में हार्पर हिन्दी से प्रकाशित इनके पहले उपन्यास ‘अल्पाहारी गृहत्यागी : आई आई टी से पहले’ ने कई युवा हिन्दी लेखकों को प्रेरित किया। 2016 में प्रकाशित इनकी दूसरी पुस्तक ‘अभिनव सिनेमा : रस सिद्धान्त के आलोक में विश्व सिनेमा का परिचय’ हिन्दी के वरिष्ठ आलोचकों द्वारा काफी सराही गई। प्रचण्ड प्रवीर वर्तमान में गुड़गाँव (हरियाणा) में एक रिस्क मैनेजमेंट फर्म में काम कर रहे हैं।

उदय प्रकाश

मध्य प्रदेश के सीतापुर गाँव में जन्मे उदय प्रकाश ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के मणिपुर केन्द्र में चार वर्ष तक अध्यापन करने के बाद दो वर्ष तक मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग में काम किया और ‘पूर्वग्रह’ पत्रिका में सम्पादन सहयोग किया। नौ वर्षों तक ‘दिनमान’ के सम्पादकीय विभाग में, कुछ समय तक टेलीविजन में पटकथा लेखन और ‘संडे मेल’ में वरिष्ठ सहायक सम्पादक के रूप में काम करने के बाद मीडिया से जुड़े रहे और स्वतन्त्र लेखन करते रहे। उनकी कई कृतियों के अंग्रेज़ी, जर्मन, जापानी एवं अन्य अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद हुए हैं, कई कहानियों के नाट्य रूपान्तरण और सफल मंचन भी हुए हैं। ‘उपरान्त’ और ‘मोहनदास’ कहानियों पर बनी फ़ीचर फिल्मों को अंतर्राष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं। कहानी, कविता तथा अन्य विधाओं में उनकी लगभग 20 कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘मोहनदास,’ ‘तिरिछ,’ ‘पीली छतरी वाली लड़की,’ ‘पाल गोमरा का स्कूटर’ और ‘दत्तात्रेय के दुख’ उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। ‘मोहनदास’ के लिए उन्हें वर्ष 2010 का साहित्य अकादेमी सम्मान मिल चुका है। इसके अलावा उन्हें भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, ओमप्रकाश साहित्य सम्मान, श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार, मुक्तिबोध सम्मान, रामकृष्ण जयदयाल सद्भावना सम्मान, पहल सम्मान, कथाक्रम सम्मान और द्विजदेव सम्मान भी प्राप्त हो चुके हैं।

अनामिका

डॉ. अनामिका ने अब तक विपुल लेखन किया है जिनमें आठ कविता संग्रह, पाँच कहानियाँ और आलोचना की कई पुस्तकें शामिल हैं। स्त्रीवादी विचारधारा से युक्त इनका स्वर और रचनाएँ अंग्रेज़ी और हिन्दी के नवोदित लेखकों और कई पीढ़ियों के पाठकों को प्रेरित करती हैं। डॉ. अनामिका ने अनेक विख्यात कृतियों का अनुवाद किया है। डॉ. अनामिका अकादमिक रूप से दिल्ली में कार्यरत हैं और द्विभाषी लेखक के रूप में 20 से अधिक राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय रचनाओं का प्रकाशन कर चुकी हैं। वे एक प्रशिक्षित शास्त्रीय नृत्यांगना भी हैं। वर्तमान में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में अंग्रेज़ी की प्राध्यापिका के रूप में कार्यरत हैं। डॉ. अनामिका को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है जिनमें भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, गिरिजा कुमार माथुर सम्मान, साहित्यकार सम्मान, परम्परा सम्मान और केदार सम्मान शामिल हैं। अनुवाद कार्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें जनवरी 2017 में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान जयपुर बुक मार्क के मंच से वाणी फ़ाउंडेशन का ‘डिस्टिंग्विश्ड ट्रांसलेटर अवार्ड’ प्रदान किया है।

मंगलेश डबराल

मंगलेश डबराल विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लम्बे समय तक काम करने के बाद वे तीन वर्ष तक नेशनल बुक ट्रस्ट के सलाहकार रहे। अब तक उनके पाँच कविता संग्रह, तीन गद्य संग्रह और साक्षात्कारों की एक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है। उन्होंने अनेक शीर्ष विदेशी कवियों की कविताओं का अंग्रेज़ी से अनुवाद किया है तथा अनेक विशिष्ट साहित्यकारों पर केन्द्रित वृत्तचित्रों के लिए पटकथा लेखन भी किया है। वे निरन्तर समाज, संगीत, सिनेमा और कला पर समीक्षात्मक लेखन करते रहे हैं। लगभग सभी भारतीय भाषाओं के अलावा 12 विदेशी भाषाओं की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। उनके कविता संग्रह ‘आवाज़ भी एक जगह है’ का इतालवी अनुवाद और ‘दिस नंबर डज नॉट एग्ज़िस्ट’ नाम से अंग्रेज़ी में अनुवादित एक पुस्तक प्रकाशित हो चुका है। उन्हें ओमप्रकाश स्मृति सम्मान, शमशेर सम्मान, पहल सम्मान, साहित्य अकादेमी सम्मान, हिंदी अकादेमी (दिल्ली) का साहित्यकार सम्मान और कुमार विकल स्मृति सम्मान जैसे महत्त्वपूर्ण सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। जन संस्कृति मंच से जुड़े मंगलेश डबराल आजीविका हेतु पत्रकारिता से सम्बद्ध हैं।

लीलाधर मंडलोई

लीलाधर मंडलोई जन्म: जन्माष्टमी। सही तिथि व साल अज्ञात। शिक्षा: बी.ए. बीएड. (अँग्रेज़ी) पत्रकारिता में स्नातक। एम.ए. (हिन्दी)। प्रसारण में उच्च-शिक्षा सी.आर.टी., लन्दन से। पदभार: दूरदर्शन, आकाशवाणी के महानिदेशक सहित कई राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय समितियों के साथ ही प्रसार भारती बोर्ड के सदस्य। कृतियाँ: घर-घर घूमा, रात बिरात, मगर एक आवाज़, काल बांका तिरछा, क्षमायाचना, लिखे में दुक्ख, एक बहुत कोमल तान, महज शरीर नहीं पहन रखा था उसने, उपस्थित है समुद्र (हिन्दी व रूसी में) (कविता-संग्रह); देखा-अदेखा, कवि ने कहा, हत्यारे उतर चुके हैं क्षीर सागर में, प्रतिनिधि कविताएँ, 21वीं सदी के लिए पचास कविताएँ (कविता चयन); कविता का तिर्यक (आलोचना); अर्थजल, दिल का किस्सा (निबन्ध); दाना-पानी, दिनन दिनन के फेर (डायरी); काला पानी (यात्रा-वृत्तान्त); बुन्देली लोकगीतों की किताब, अन्दमान निकोबार की लोककथाओं की दो किताबें; पेड़ भी चलते हैं, चाँद का धब्बा (बाल साहित्य)। सम्पादन: केदारनाथ सिंह संचयन, कविता के सौ बरस, स्त्री मुक्ति का स्वप्न, कवि एकादश, रचना समय, समय की कविता आदि। अनुवाद: पानियों पे नाम (शकेब जलाली की गज़्लो का लिप्यन्तरण मंजूर एहतेशाम के साथ)। माँ की मीठी आवाज़ (अनातोली पारपरा की रूसी कविताएँ, अनिल जनविजय के साथ)। फिल्म: कई रचनाकारों पर डाक्यूमेंट्री निर्माण, निर्देशन तथा पटकथा लेखन। कुछ धारावाहिकों में कार्यकारी निर्माता तथा संगीत व साहित्य के ऑडियो-वीडियो सीडी, वीसीडी के निर्माण में सक्रिय भूमिका। सम्प्रति: निदेशक, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली और साहित्यिक पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ के सम्पादक।

सविता सिंह

सविता सिंह इग्नू के स्कूल ऑफ जेंडर एंड डेवलपमेंट स्टडीज में प्रोफेसर हैं। उन्होंने 2009 से इस स्कूल में सेवाएँ आरम्भ कीं और इसकी पहली निदेशक बनीं। वे यहाँ जेंडर स्टडीज में एम.फिल. और पीएच.डी. पाठ्यक्रमों का समन्वयन करती हैं। एक संस्थापक निदेशक के तौर पर उन्होंने जेंडर और विकास अध्ययन के क्षेत्र में नयी दृष्टियों का विकास किया है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए और एम.फिल की उपाधि प्राप्त की और मैकगिल विश्वविद्यालय, मोंट्रेल से उच्च शिक्षा प्राप्त की जहाँ उन्होंने प्रो. चार्ल्स टेलर, जेम्स टुली और सैम नौमोफ के शोध सहयोगी के रूप में तीन वर्ष तक राजनीतिक सिद्धान्त का अध्यापन किया। बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय से ‘डिस्कोर्स ऑफ़ मॉडर्निटी इन इंडिया : ए हरमेन्युटिकल स्टडी’ पर पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की। सविता सिंह राजनीतिक चिन्तन के अलावा कविता की विधा में भी निरन्तर लेखन करती हैं। ‘अपने जैसा जीवन’ और ‘स्वप्न समय’ उनके चर्चित कविता संग्रह हैं।

गगन गिल

1959 में दिल्ली में जन्मी गगन गिल मूलतः पत्रकार रही हैं हालाँकि आगे चलकर वे पत्रकारिता की जगह कविता में अधिक सक्रिय हो गयीं। ‘एक दिन लौटेगी लड़की,’ ‘अँधेरे में बुद्ध,’ ‘यह आकांक्षा समय नहीं’ और ‘थपक थपक दिल थपक थपक’ उनके प्रमुख कविता संग्रह हैं। उनकी अधिकांश कृतियों में बुद्ध की करुणा और उनके सत्यों को बिम्ब-प्रतिबिम्ब के रूप में रचा गया है। गगन गिल एक सफल अनुवादक भी हैं और अबतक उन्होंने 10 पुस्तकों का अनुवाद किया है। स्वयं उनकी कृतियों के भी अनेक भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर आधारित बेजोड़ गद्य कृति ‘अवाक्’ ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें अब तक द्विजदेव सम्मान, भारत भूषण अग्रवाल सम्मान, संस्कृति पुरस्कार और केदार सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।

मीरा जौहरी

मीरा जौहरी हिन्दी की प्रकाशन संस्था राजपाल एंड संस की मुख्य साझीदार हैं। उन्होंने फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज (दिल्ली विश्वविद्यालय) से एम.बी.ए. करने के बाद प्रमुख कम्पनियों में मार्केटिंग कंसल्टेंट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। पिछले 20 वर्षों से राजपाल एंड संस से जुड़ी रहकर उन्होंने बहुभाषीय शब्दकोशों की एक पूरी शृंखला तैयार करवाई है जिनमें आज देश भर में सबसे अधिक बिकने वाले शब्दकोश शामिल हैं। उन्होंने हिन्दी प्रकाशन के सीमित दायरे को बढ़ाते हुए अंग्रेज़ी में भी उल्लेखनीय प्रकाशन किया और एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जिसके तहत भारत के क्षेत्रीय प्रकाशकों के साथ-साथ विदेशों में भी पुस्तकों के भाषा अधिकार बेचे जा सकें। देश और दुनिया के ख्याति प्राप्त लेखकों की कृतियों को सुलभ बनाने के लिए उन्होंने एक बेहद सक्रिय अनुवाद प्रकाशन कार्यक्रम की नींव रखी है।

नीता गुप्ता

नीता गुप्ता जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से सम्बद्ध जयपुर बुकमार्क की सह-निदेशक हैं जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनुवाद के स्वत्वाधिकार के लिए काम करता है। वे यात्रा बुक्स की प्रकाशक हैं और भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद को बढ़ावा देने वाली गैर-लाभकारी संस्था भारतीय अनुवाद परिषद् में सम्पादक और संयुक्त सचिव हैं। 1996 से वे भारतीय भाषाओं के अनुवाद के विविध पक्षों पर काम कर रही हैं और पुस्तक प्रकाशन, ई-बुक और साहित्यिक पत्रिका के सम्पादन से जुड़ी रही हैं। हाल ही में उन्होंने ‘ट्रांसलेटिंग भारत, रीडिंग इंडिया’ नाम से निबन्धों का एक संकलन सम्पादित किया है।

अलिन्द माहेश्वरी

अलिन्द माहेश्वरी राजकमल प्रकाशन समूह के मार्केटिंग और कॉपीराइट निदेशक हैं। एस.पी. जैन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च, मुम्बई से पोस्ट-ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने प्रकाशन समूह के लिए आधुनिक रिटेल, इ-कॉमर्स और ई-बुक सेक्शन की शुरुआत की। आज के बाज़ार में हिन्दी पुस्तकों के बेहतर प्रमोशन के लिए वे बाज़ार और गुणवत्ता के संतुलन को महत्त्व देते हैं। अलिन्द ने युवा और नये लोगों की एक टीम को प्रकाशन समूह से जोड़ा है और हिन्दी पुस्तकों की ओर नये पाठकों को आकर्षित किया है।

अदिति माहेश्वरी-गोयल

अदिति माहेश्वरी-गोयल अंग्रेज़ी साहित्य में परास्नातक हैं। इन्होंने स्ट्रेथक्लाइड बिजनेस स्कूल, स्कॉटलैंड से बिजनेस मैनेजमेंट तथा टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस, मुम्बई से प्री-डॉक्टरल/एम.फिल. की डिग्री प्राप्त की है। आप हिन्दी की अग्रणी प्रकाशन संस्था वाणी प्रकाशन की निदेशक हैं। प्रकाशन के कॉपीराइट और अनुवाद विभाग की प्रमुख और वाणी फाउंडेशन की प्रबन्ध न्यासी हैं। वे 3 और 4 मार्च 2017 को वाणी फ़ाउंडेशन और इन्द्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित होने वाले दो दिवसीय ‘हिन्दी महोत्सव’ की फेस्टिवल डायरेक्टर हैं।

रविन्दर सिंह

रविन्दर सिंह भारत के एक बेस्टसेलर लेखक हैं। इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस, हैदराबाद के पूर्व-छात्र रहे रविन्दर माइक्रोसॉफ्ट में सीनियर प्रोग्राम मैनेजर के रूप में अपने 8 साल लम्बे आई टी करियर को छोड़कर एक पूर्णकालिक लेखक बन गए हैं। ‘आई हैड टू ए लव स्टोरी’ उनकी बेस्टसेलर किताब है जो उनकी ज़िन्दगी की सच्ची घटनाओं पर आधारित है। यह किताब कन्नड़ में भी प्रकाशित हो चुकी है। ‘कैन लव हैपेन ट्वाइस,’ ‘लव स्टोरीज दैट टच माय हार्ट,’ ‘लाइक इट हैपेंड यस्टरडे,’ ‘योर ड्रीम्स आर माइन नाउ,’ ‘टेल मी ए स्टोरी’ और ‘दिस लव दैट फील्स राईट’ उनकी अन्य कृतियाँ हैं। उन्होंने ब्लैक इंक नाम से एक प्रकाशन गृह भी शुरू किया है जिसके तहत वे नए लेखकों की पहली कृतियाँ प्रकाशित करते हैं।

सुधीर मिश्रा

सुधीर मिश्रा प्रतिभाशाली पटकथा लेखक और फ़िल्म निर्देशक हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद ‘वर्कशॉप थिएटर’ नाम से एक नाट्य मंडली बनाई और भारतीय सिनेमा जगत में ‘जाने भी दो यारो’ (1983), ‘मोहन जोशी हाजिर हो’ (1984) और ‘ख़ामोश’ (1985) जैसी फ़िल्मों में बतौर सहायक निर्देशक और पटकथा लेखक काम करने लगे। अपनी पहली निर्देशित फ़िल्म ‘ये वो मंज़िल तो नहीं’ (1987) के लिए उन्हें नेशनल अवार्ड प्रदान किया गया। बाद में उन्होंने ‘धारावी’ (1991), ‘इस रात की सुबह नहीं’ (1996) और ‘चमेली’ (2003) जैसी फ़िल्में भी बनाईं। ‘खोया खोया चाँद’ (2007) और ‘ये साली ज़िन्दगी’ (2011) उनकी बहुचर्चित फ़िल्में हैं। ‘इनकार’ (2013) और ‘देवदास’ (2015) उनकी अब तक की अन्तिम फ़िल्में हैं।

अजित राय

अजित राय देश के उन गिने-चुने साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रकारों में से एक हैं जिन्होंने पिछले 25 वर्षों में देश के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय अखबारों, पत्रिकाओं एवं रेडियो-टेलीविजन में साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, संस्कृति के अन्य रूपों एवं बौद्धिक विषयों पर लगातार लेखन किया है। हिंदी में उनके अब तक प्रकाशित बहुसंख्यक आलेखों, रिपोर्ताजों, रपटों, समीक्षाओं, साक्षात्कारों एवं आवरण कथाओं में से अधिकतर देश की सांस्कृतिक पत्रकारिता में मील का पत्थर माने गए हैं। उनकी कई रपटों पर भारतीय संसद में सवाल पूछे गए हैं एवं बहसें हो चुकी हैं। अजित राय इस समय हिन्दी के विरल पत्रकार हैं जिन्हें सच्चे अर्थों में अंतरराष्ट्रीय कहा जा सकता है। उन्होंने पिछले दस वर्षों में दुनिया भर में हो रही साहित्य, संस्कृति, रंगमंच और सिनेमा की तमाम महत्त्वपूर्ण गतिविधियों को अपनी रिपोर्टिंग के माध्यम से हिंदी संसार को परिचित कराया है।

सुधीश पचौरी

जन्मः 29 दिसम्बर 1948, जनपद अलीगढ़। शिक्षाः एम.ए. (हिन्दी) (आगरा विश्वविद्यालय), पीएच.डी. एवं पोस्ट डॉक्टरोल शोध (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली। मार्क्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तम्भकार, मीडिया विशेषज्ञ। चर्चित पुस्तकें नई कविता का वैचारिक आधार; कविता का अन्त; दूरदर्शन की भूमिका; दूरदर्शनः स्वायत्तता और स्वतन्त्रता (सं.); उत्तर-आधुनिक परिदृश्य; उत्तर-आधुनिकता और उत्तर संरचनावाद; नवसाम्राज्यवाद और संस्कृति; नामवर के विमर्श (सं.); उत्तर-आधुनिक साहित्य विमर्श; दूरदर्शनः विकास से बाज़ार तक; उत्तर-आधुनिक साहित्यिक-विमर्श; देरिदा का विखण्डन और विखण्डन में ‘कामायनी’; मीडिया और साहित्य; टीवी टाइम्स; साहित्य का उत्तरकाण्ड; अशोक वाजपेयी पाठ कुपाठ (सं.); प्रसार भारती और प्रसारण-परिदृश्य; दूरदर्शनः सम्प्रेषण और संस्कृति, स्त्री देह के विमर्श; आलोचना से आगे; मीडिया, जनतन्त्रा और आतंकवाद; निर्मल वर्मा और उत्तर-उपनिवेशवाद; विभक्ति और विखण्डन; हिन्दुत्व और उत्तर- आधुनिकता; मीडिया की परख; पॉपूलर कल्चर; भूमण्डलीकरण, बाज़ार और हिन्दी; टेलीविजन समीक्षाः सिद्धान्त और व्यवहार; उत्तर-आधुनिक मीडिया विमर्श; बिंदास बाबू की डायरी; फासीवादी संस्कृति और पॉप-संस्कृति,रीतिकाल: सेक्सुयलिटी का समारोह सम्मानः मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् का रामचन्द्र शुक्ल सम्मान (देरिदा का विखण्डन और विखण्डन में ‘कामायनी’); भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार से सम्मानित; दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा ‘साहित्यकार’ का सम्मान, शमशेर सम्मान एवं केन्द्रीय संस्था का सुब्रह्रणयम भारती सम्मान! पूर्व अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, पूर्व डीन ऑफ कॉलेज, पूर्व एवं प्रोवाइसचांसलर, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।

अन्विता अब्बी

अन्विता अब्बी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भाषाशास्त्र की प्रोफेसर हैं। उन्होंने जनजातीय भाषाओं और दक्षिण एशिया की अन्य अल्पसंख्यक भाषाओं पर किए गए अपने अध्ययन और शोध के कारण दुनिया भर में ख्याति अर्जित की है। अंडमान निकोबार दीप समूह की लुप्तप्राय भाषा पर उनके विशिष्ट कार्य को देश और दुनिया भर में बहुत सराहा गया है। उन्हें भारत के एक नये भाषा परिवार की खोज करने का श्रेय है। वे लन्दन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएण्टल एंड अफ्रीकन स्टडीज (एसओएएस) के लिवरह्यूम प्रोफेसर अवार्ड से सम्मानित हैं। भारत की भाषाओं में उल्लेखनीय योगदान के लिए वे मैक्स प्लांक इंस्टिट्यूट ऑफ एवोल्यूशनरी एंथ्रोपोलॉजी (लैग्ज़िग, जर्मनी) में विजिटिंग साइंटिस्ट, कैर्न्स इंस्टिट्यूट (जेम्स कुक विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया) में विसिटिंग प्रोफेसर और इंस्टिट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडी (ला ट्रोब यूनिवर्सिटी, मेलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया) में डिस्टिंग्विश्ड फेलो रह चुकी हैं। भारत की जनजातीय भाषाओं में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रीय लोकभाषा सम्मान मिल चुका है। प्रो. अन्विता अब्बी टेरालिंग्वा और यूनेस्को जैसी अनेक अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में सलाहकार समिति की सदस्य हैं और इस समय लिंग्विस्टिक सोसाइटी ऑफ इंडिया की अध्यक्ष हैं। हाल ही में उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया है।

प्रियदर्शन

प्रियदर्शन की गिनती उन दुर्लभ मीडियाकर्मियों में होती है जिन्होंने मीडिया को केवल यश कमाने का जरिया न बनाकर उसे व्यावहारिक स्तर पर सोचने-समझने का एक लोकतान्त्रिक स्पेस दिया है। किसी ख़ास पेशे में रहते हुए भी अपने व्यापक सरोकारों के चलते वे निरन्तर एक संस्कृतिकर्मी की सक्रिय भूमिका में आते रहे हैं। प्रियदर्शन जी का साहित्य से भी बहुत गहरा लगाव है और वे लम्बे अरसे से साहित्य, समाज, सिनेमा तथा मीडिया पर लगातार लिख रहे हैं। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित ‘ग्लोबल समय में गद्य,’ ‘ग्लोबल समय में कविता’ और ‘नये दौर का नया सिनेमा’ जैसी पुस्तकों में उनके अध्ययन के बहुआयामी पहलुओं को देखा जा सकता है। अब तक उनके दो कविता संग्रह और दो कहानी संग्रहों के अलावा आलोचना की चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने कई विश्वप्रसिद्ध कालजयी कृतियों का अनुवाद भी किया है। ‘उसके हिस्से का जादू’ कहानी संग्रह के लिए उन्हें वर्ष 2009 का स्पंदन सम्मान मिल चुका है और वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘नये दौर का नया सिनेमा’ को नवम्बर 2016 में मुम्बई के मामी फिल्म समारोह में हिन्दी के लिए ‘राइटिंग इन एक्सिलेंस स्पेशल मेंशन’ में शामिल किया गया है।

भगवानदास मोरवाल

समकालीन साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश में एक लेखक और बुद्धिजीवी के रूप में भगवानदास मोरवाल की सक्रिय उपस्थिति है। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित उनकी नवीनतम कृति ‘पकी जेठ का गुलमोहर’ इन दिनों काफी चर्चित है। पिछले वर्ष प्रकाशित उनका एक और महत्त्वपूर्ण उपन्यास ‘हलाला’ मुस्लिम समुदाय में धर्म की आड़ में होने वाले स्त्री-शोषण को केन्द्र में रखकर लिखा गया है जो अपने विचारोत्तेजक कथ्य के कारण लगातार चर्चा और विमर्श का विषय बना हुआ है। भगवनदास मोरवाल ने पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है और हिन्दी साहित्य से उच्च शिक्षा पूरी की है। अब तक उनके पाँच उपन्यास और छह कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ‘काला पहाड़’ और ‘हलाला’ जैसे उपन्यासों को पाठकों और बुद्धिजीवियों द्वारा खूब पसन्द किया गया है। कविता की दो पुस्तकों के अलावा उन्होंने वैचारिक गद्य की भी एक पुस्तक लिखी है। अबतक उन्हें कथाक्रम सम्मान, हिन्दी अकादमी (दिल्ली) के साहित्यिक कृति सम्मान के अलावा हरियाणा साहित्य अकादमी सम्मान, अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान, कथा लन्दन (यू के) और शब्द साधक ज्यूरी जैसे प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। वर्ष 2008 में उन्होंने ट्यूरिन (इटली) में आयोजित भारतीय लेखक सम्मलेन में भी शिरकत भी की है।

अनंत विजय

अनंत विजय प्रसिद्ध स्तंभकार और मीडिया विशेषज्ञ हैं। जमालपुर (बिहार) से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने भागलपुर विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में स्नातक की उपाधि और बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता और बिजनेस मैनेजमेंट की शिक्षा पूरी की है। ‘प्रसंगवश,’ ‘तुमुल कोलाहल कलह में’ और ‘बॉलीवुड सेल्फ़ी’ उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। अपनी विषय-वस्तु और विश्लेषण के कारण ‘बॉलीवुड सेल्फ़ी’ ने काफी चर्चा बटोरी है। अनंत विजय इस समय IBN7 में डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं।

अद्वैता काला

अद्वैता काला पेशे से होटल व्यवसायी हैं जिन्होंने भारत और बाहर के देशों में अध्ययन और काम किया है। अपने काम और व्यवसाय से सिलसिले में उन्हें कई शहरों में घुमन्तू जीवन व्यतीत करना पड़ा है। वे खूब यात्राएँ करती हैं—हरेक महीने या कभी-कभी महीने में दो बार भी उन्हें शहर से बाहर रहना पड़ता है। वे भारतीय रेल को बहुत पसन्द करती हैं और मानती हैं कि इस विविधता से भरे देश को जानने-समझने के लिए इससे अच्छा और कोई जरिया नहीं हो सकता। वे लिखती भी हैं लेकिन इसे बहुत व्यक्तिगत और निजी मानती हैं। किताबों से बहुत लगाव है—ठीक उसी तरह जैसे कि दोस्तों और परिवार के सदस्यों से। उन्हें सस्पेंस या थ्रिलर राइटिंग, जीवनियाँ, इतिहास (ख़ासकर मुग़ल इतिहास) और ताजमहल के बारे में पढ़ने और जानने की बहुत दिलचस्पी है।

ओम थानवी

ओम थानवी साहित्य, कला, सिनेमा, रंगमंच, पुरातत्त्व और पर्यावरण में गहरी रुचि रखते हैं। देश-विदेश में भ्रमण कर चुके हैं। बहुचर्चित यात्रा-वृत्तान्त ‘मुअनजोदाड़ो’ के लेखक हैं। ‘अपने अपने अज्ञेय’ पुस्तक का मूलत: उद्देश्य सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' को श्रद्धांजलि अर्पित करना है। अज्ञेय के साथ ओम थानवी के पारिवारिक सम्बन्ध भी रहे हैं, थानवी जी अज्ञेय से मिलते रहते थे। एक लगाव से वह अज्ञेय को कितना समझ पाए और अज्ञेय के बारे में कितना संकलन कर पाए। इन्होंने इसका सही रूप 'अपने अपने अज्ञेय' पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया है!

वर्तिका नन्दा

वर्तिका नन्दा एक सक्रिय मीडियाकर्मी, शिक्षक और चिन्तक हैं। उन्होंने बलात्कार और प्रिंट मीडिया की रिपोर्टिंग पर पीएच.डी की है और दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज में पत्रकारिता का अध्यापन करती हैं। अपने अध्यापन और कार्य क्षेत्र में उन्होंने मीडिया साहित्य और अपराध को लेकर कई प्रयोग किए हैं। वे जीटीवी, एनडीटीवी, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली और लोकसभा टीवी से जुड़ी रहीं और भारतीय टेलीविजन में अपराध बीट की प्रमुख पत्रकार रही हैं। तिहाड़ के महिला कैदियों की कविताओं का संग्रह ‘तिनका तिनका तिहाड़,’ घरेलू हिंसा पर केन्द्रित देश का पहला कविता संग्रह ‘थी. हूँ..रहूँगी...’ और ‘टेलीविजन और क्राइम रिपोर्टिंग’ उनकी चर्चित पुस्तकें हैं। ‘रानियाँ सब जानती हैं’ उनका नवीनतम कविता संग्रह है। इन रचनाओं पर केन्द्रित सीडी और फ़िल्में भी बन चुकी हैं। विविध क्षेत्रों में उनके योगदान के लिए अब तक उन्हें लाडली मीडिया अवॉर्ड, यूथ आइकॉन अवॉर्ड, परंपरा ऋतुराज सम्मान, डॉ राधाकृष्ण मीडिया अवॉर्ड, भारतेंदु हरिश्चंद्र अवॉर्ड और सुधा पत्रकारिता सम्मान एवं स्त्री शक्ति पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।

विनोद दुआ

विनोद दुआ ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक और स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की है। उन्होंने 1974 में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ‘युवा मन’ के साथ टेलीविजन की दुनिया में दस्तक दी। 1984 का वर्ष उनके करियर के लिए बेहद ख़ास रहा जब उन्होंने प्रनॉय राय के साथ एक विशेष कार्यक्रम में चुनाव विश्लेषक के रूप में भाग लिया। 1985 में उन्होंने ‘जनवाणी’ कार्यक्रम की मेजबानी शुरू की जिसे लोगों ने काफी पसंद किया। दो वर्ष बाद वे बतौर चीफ प्रोड्यूसर इंडिया टुडे समूह के ‘टीवी टुडे’ चैनल से जुड़े और 1988 में ‘द कम्युनिकेशन ग्रुप’ नाम से अपनी प्रोडक्शन कम्पनी शुरू की। उन्होंने जीटीवी पर ‘चक्रव्यूह’ (1992) और दूरदर्शन पर ‘परख’ (1992-96) की प्रस्तुति की और फिर प्रधान सम्पादक के रूप में न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया से जुड़े जहाँ उन्होंने प्राइम टाइम शो ‘विनोद दुआ लाइव’ की मेजबानी की। उन्होंने विविध चैनलों पर ‘तस्वीर-ए-हिन्द,’ ‘चुनाव चुनौती,’ ‘इलेक्शन एनालसिस,’ ‘प्रतिदिन,’ ‘कौन बनेगा मुख्यमन्त्री,’ ‘ज़ायका इंडिया का’ और ‘जन की बात’ जैसे अनेक कार्यक्रमों की मेजबानी की। पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें बी डी गोयनका अवार्ड फॉर एक्सलेंस इन जर्नलिज्म, आई टी एम यूनिवर्सिटी से डी. लिट्. की मानद उपाधि और भारत सरकार की ओर से पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया है।

ऋचा अनिरुद्ध

ऋचा अनिरुद्ध हमारे समय की एक बेहद प्रतिभाशाली पत्रकार हैं। वे ख़ास तौर पर IBN7 की प्राइम टाइम प्रस्तुति के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने IBN7 पर ‘ज़िन्दगी लाइव’ कार्यक्रम का भी संचालन किया है। पत्रकारिता के अलावा उनकी अकादमिक पृष्ठभूमि भी काफी ठोस रही है। उन्होंने दूरदर्शन से अपना व्यावसायिक करियर शुरू किया और बाद में IBN7 से प्राइम टाइम कार्यक्रम की प्रस्तोता के रूप में जुड़ गईं।

अरविन्द गौड़

अरविन्द गौड़ मूलतः एक रंग निर्देशक हैं लेकिन उन्होंने पत्रकारिता से अपने करियर की शुरुआत की और प्रसिद्ध नाट्यमंडली ‘अस्मिता’ (दिल्ली) की स्थापना से कुछ समय पहले तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में काम किया। उन्होंने स्टेनफोर्ड, हार्वर्ड, स्टोनी ब्रुक और स्मिथोनियन जैसे अनेक विश्वविख्यात विश्वविद्यालयों में रंग निर्देशन से सम्बन्धित कार्यशालाओं का संचालन किया है और कई प्रस्तुतियाँ भी दी हैं। पिछले लगातार 15 वर्षों से अरविन्द गौड़ ने 60 से भी अधिक नाटकों का निर्देशन किया है जिनमें ‘हानूश,’ ‘तुगलक,’ ‘रक्त कल्याण,’ ‘अंधा युग’ और ‘कोर्ट मार्शल’ प्रमुख हैं। ‘चुकायेंगे नहीं’ उनके द्वारा निर्देशित एक ऐसा नाटक है जिसमें सामाजिक संदेश के स्वर को प्रमुखता से उभारा गया है।

मैत्रैयी पुष्पा

जन्म : 30 नवम्बर, 1944, अलीगढ़ जि़ले के सिकुर्रा गाँव में। आरम्भिक जीवन : जि़ला झाँसी के खिल्ली गाँव में। शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी साहित्य), बुंदेलखंड कॉलेज, झाँसी। कृतियाँ : चिन्हार, गोमा हँसती है, ललमुनिया तथा अन्य कहानियाँ, पियरी का सपना, प्रतिनिधि कहानियाँ, समग्र कहानियाँ (कहानी-संग्रह); बेतवा बहती रही, इदन्नमम, चाक, झूला नट, अल्मा कबूतरी, अगनपाखी, विजन, कही ईसुरी फाग, त्रिया हठ, गुनाह-बेगुनाह, फ़रिश्ते निकले (उपन्यास); कस्तूरी कुंडल बसै, गुड़िया भीतर गुड़िया (आत्मकथा); खुली खिड़कियाँ, सुनो मालिक सुनो, चर्चा हमारा, आवाज़, तब्दील निगाहें (स्त्री विमर्श); फाइटर की डायरी (रिपोर्ताज)। फैसला कहानी पर टेलीफिल्म वसुमती की चिट्ठी। प्रमुख सम्मान : सार्क लिट्रेरी अवार्ड, 'द हंगर प्रोजेक्ट’ (पंचायती राज) का सरोजिनी नायडू पुरस्कार, मंगला प्रसाद पारितोषिक, प्रेमचन्द सम्मान, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार सम्मान, मध्यप्रदेश साहित्य परिषद का वीरसिंह जूदेव पुरस्कार, कथाक्रम सम्मान, शाश्वती सम्मान एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का महात्मा गांधी सम्मान। सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय हस्तक्षेप।

गीताश्री

गीताश्री का जन्म मुजफ्फरपुर ( बिहार ) में हुआ । सर्वश्रेष्ठ हिन्दी पत्रकार ( वर्ष 2008-2009) के लिए रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार गीताश्री पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य की दुनिया में सक्रिय हैं । सम्प्रति : आउटलुक (हिन्दी ) दिल्ली में सहायक संपादक!

स्मिता परिख

स्मिता परिख आकाशवाणी में उद्धघोषिका, अभिनेत्री, और मइप्र्र एंटरटेनमेंट की मुख्य प्रबन्धक स्मिता परिख ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा मध्य प्रदेश के इन्दौर शहर में की, कॉमर्स में स्नातकोत्तर की डिग्री राजस्थान के उदयपुर शहर में हासिल की। बचपन से ही कविताएँ और कहानियाँ लिखने की शौकीन स्मिता को कक्षा 11 वीं में मात्रा 15 वर्ष की उम्र में राजस्थान साहित्य अकादेमी से कहानी लेखन के लिए युवा साहित्यकार पुरस्कार प्राप्त हुआ, उसी साल महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन से कविता लेखन के लिए, पुरस्कार प्रदान किया गया। आकाशवाणी उदयपुर और फिर आकाशवाणी मुम्बई से जुड़ाव रहा और स्मिता ने एफएम चैनल पर कई सफल कार्यक्रमों का संचालन किया, ‘अपने मेरे अपने’ और ‘जाएँ कहाँ’ जैसे प्रसिद्ध टेलीविज़न कार्यक्रमों में मुख्य भूमिकाएँ निभायीं। दूरदर्शन के नैशनल चैनल पर कई सफल कार्यक्रमों जैसे -बायस्कोप’, ‘सिने सतरंगी’, ‘डीडी टॉप 10’ का संचालन किया। संगीत जगत के सभी दिग्गजों के साथ विश्व भर में भ्रमण किया और संचालन किया। मुम्बई में इनकी मइप्र्र एंटरटेनमेंट के नाम से एक कम्पनी है जो देश-विदेश में इवेंट्स करती है। मुम्बई का प्रसिद्ध साहित्यिक सम्मेलन -लिट्-ओ- फेस्ट मुम्बई का सम्पूर्ण निर्देशन स्मिता करती हैं। ये इस महोत्सव की प्रबन्धक हैं। देश भर से इस सम्मेलन में नामी साहित्यकार हिस्सा लेते हैं। हिन्दी भाषा को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर लाने का ये एक अभियान है। ‘मैं पन्थ निहारूँ...’ स्मिता का पहला कविता संग्रह है जो 2014 में प्रकाशित हुआ। ‘नज़्मे इन्तजशर कीं...’ उन चुनी हुई नज़्मों का संकलन है... जिनमें प्रेम, क्षृंगार इन्त्ज़ार की सम्मिलित भावनाएँ देखी जा सकती हैं। स्मिता परिख ने हमेशा प्रेम की विभिन्न भावनाओं पर लिखा है, ये नज़्मों की किताब उसका एक अनूठा उदाहरण है...

सुरेन्द्र मोहन पाठक

सुरेन्द्र मोहन पाठक हिन्दी में क्राइम फिक्शन के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक हैं और अबतक लगभग 300 उपन्यास लिख चुके हैं। उनका लेखन पाँचवे दशक के अंतिम वर्षों से शुरू होकर आजतक बदस्तूर जारी है। उनकी पहली कहानी ‘57 साल पुराना आदमी’ 1959 में (‘मनोहर कहानियाँ’ में) और पहला उपन्यास ‘पुराने गुनाह, नए गुनाहगार’ 1963 में प्रकाशित हुआ। उनके समग्र लेखन को पाँच प्रमुख श्रेणियों में रखा गया है। उनके लेखन का विपुलांश कुछ ख़ास चरित्रों और नायकों पर केन्द्रित है जो बिलकुल अजनबी और कभी-कभी बिलकुल जानी-पहचानी परिस्थितियों के शिकार हो जाते हैं। ‘सुनील सीरीज’ उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण उपन्यास शृंखला है जिसमें 121 उपन्यास शामिल हैं। यह शृंखला सुनील नाम के एक केन्द्रीय पात्र पर आधारित है जो एक खोजी पत्रकार है। ‘सुधीर कोहली’ और ‘विमल सीरीज’ उनकी अन्य उपन्यास शृंखलाएँ हैं। ‘थ्रिलर्स’ सीरीज के उपन्यासों में उनका केन्द्रीय पात्र दुबारा प्रकट नहीं होता है। सुरेन्द्र मोहन पाठक चुटकुलों के भी बेहतरीन रचनाकार हैं, उन्होंने चुटकुलों का संकलन किया है और ‘जोक बुक्स’ में उन्हें प्रकाशित भी कराया है।

प्रभात रंजन

सीतामढ़ी, बिहार में जन्मे प्रभात रंजन ने कहानी और आलोचना विधा में उल्लेखनीय लेखन किया है। ‘जानकीपुल,’ ‘बोलेरो क्लास’ इनके प्रमुख कहानी संग्रह और ‘पत्रकारिता के युग निर्माता : मनोहर श्याम जोशी,’ और ‘मार्केज़ : जादुई यथार्थ का जादूगर’ इनकी प्रमुख आलोचना पुस्तकें हैं। पिछले वर्ष प्रकाशित ‘कोठागोई’ अपने विषय वस्तु और भाषा के कारण काफी चर्चित रही है। उन्होंने ‘एन फ्रैंक की डायरी,’ ‘श्रीनगर का षड्यन्त्र,’ ‘मुम्बई की माफिया हसीनाएँ,’ ‘जल चुके परवाने’ और ‘मोथ स्मोक’ जैसी कृतियों का अनुवाद और महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा की ‘बहुवचन’ पत्रिका के छह अंकों का सम्पादन भी किया है। अब तक उन्हें प्रेमचन्द सम्मान और सहारा समय कथा सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वर्तमान में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में हिन्दी पढ़ाते हैं और ‘जानकीपुल’ ब्लॉग का संचालन करते हैं।

संजय जोशी

‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया से हुई। पिछले बारह वर्षों से वे हिन्दुस्तानी दस्तावेज़ी सिनेमा और महत्त्वपूर्ण नए सिने प्रयासों को आम दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाने की मुहिम में अपने साथियों के साथ जुटे हैं। गोरखपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, भिलाई, पटना, नैनीताल, आजमगढ़, बलिया, देवरिया, उदयपुर, कोलकाता, हैदराबाद, रामनगर आदि शहरों में ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान व फ़िल्म सोसायटी आंदोलन की शुरुआत कराने में उनकी प्रमुख भूमिका रही है। संजय जोशी ने ‘अमरकान्त,’ ‘टके सेर भाजी टके सेर खाजा,’ ‘सवाल की जरूरत,’ ‘कॉमरेड जिया उल हक़’ जैसी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों व ‘पहाड़पुर के बच्चे’ नामक टेलीविजन धारावाहिक कथा का निर्देशन भी किया है। संजय जोशी ‘प्रतिरोध के सिनेमा’ और ‘जन संस्कृति मंच’ के पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता हैं और नवारुण प्रकाशन का भी संचालन करते हैं।

सरला महेश्वरी

सरला महेश्वरी का जन्म दिल्ली में एक गुजराती परिवार में हुआ। इन्होंने हिन्दी से एम. ए. और पीएच. डी. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। 1979 से 1984 तक वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज में प्राध्यापिका रही हैं। 1975 में वे दूरदर्शन में बच्चों से सम्बन्धित एक कार्यक्रम की प्रस्तुति से टीवी से जुडीं, पहले बच्चों के लिए स्क्रिप्ट लेखन और बाद में अनेक प्रस्तुतियाँ दीं। पाँच साल तक दूरदर्शन में अनाउंसर रहने के बाद जनवरी 1982 से दूरदर्शन पर समाचार वाचन शुरू किया। विवाहोपरान्त इंग्लैंड गईं और वहाँ बीबीसी से जुड़ीं। बीबीसी एक्सटर्नल सर्विसेस (लन्दन) और बीबीसी टीवी (बर्मिंघम) में अपनी सेवाएँ दीं। 1986 में भारत वापस लौटीं और दूरदर्शन पर दुबारा समाचार वाचन शुरू किया। उन्होंने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों के लिए विकलांग, अनाथ और झोंपड़ी में रहने वाले बच्चों के अनेक इंटरव्यू लिए हैं और कई विशिष्ट अवसरों पर राष्ट्रपति भवन, विज्ञान भवन, लाल किला, राजपथ, नेशनल स्टेडिम और लन्दन के एल्बर्ट हाल में मंच संचालन भी किया है।

निज़ामी बंधु

निज़ामी बंधु उस्ताद चन्द निज़ामी, शादाब फरीदी निज़ामी और शोराब फरीदी निज़ामी का एक विख्यात कव्वाली समूह है। निज़ामी बंधुओं के पास इस हुनर की सात शताब्दी लम्बी और समृद्ध विरासत है। प्रतिष्ठित सिकंदर घराना से सम्बन्धित निज़ामी बंधु हज़रत निजामुद्दीन औलिया के दरगाह पर अमीर ख़ुसरो की लिखी कव्वाली की प्रस्तुति करते हैं। उन्होंने अनेक प्रतिष्ठित मंचों और महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शिरकत की है। 2003 में नई दिल्ली में ‘जहाँ-ए-ख़ुसरो’ में उनकी प्रस्तुति यादगार रही। इसके अलावा उन्होंने क़ुतुब फेस्टिवल (नई दिल्ली), विरासत फेस्टिवल (देहरादून), उद्यान म्यूजिक फेस्टिवल (मुम्बई), आई टी सी संगीत रिसर्च एकेडमी (कोलकाता), स्पिक मैके (भारत के विभिन्न जगहों में) और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला (नई दिल्ली) में बेहतरीन और यादगार प्रस्तुतियाँ की हैं। उन्होंने अमेरिका, फ्रांस, कनाडा, जर्मनी, इंग्लैंड, ईरान, वेस्ट इंडीज, तंजानिया और मोरक्को आदि देशों में भी खूब नाम कमाया है। 2011 की सुपरहिट फ़िल्म ‘रॉकस्टार’ में इनकी कव्वाली प्रस्तुति को फ़िल्म के एक अभिन्न हिस्से के रूप में दिखाया गया। निजामी बंधु अपनी प्रस्तुतियों से न केवल कला के इस माध्यम की खूबियों को जाहिर करते हैं, बल्कि ख़ुदा के पाक संदेश को भी पूरी दुनिया में फैलाते हैं।

विनीता सिन्हा

विनीता सिन्हा ने पटना विश्वविद्यालय से एम.ए. और पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं और इस समय इन्द्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। यू. जी. सी. के मेजर रिसर्च प्रोजेक्ट के अन्तर्गत उन्होंने लोकगीतों और उसकी मौखिक परम्परा पर महत्तवपूर्ण शोध कार्य किया है। तुलनात्मक साहित्य, अनुवाद और अनुवाद अध्ययन, मौखिक परम्परा, उत्तर उपनिवेशवाद एवं अंग्रेज़ी भाषा शिक्षण उनकी विशेषज्ञता के क्षेत्र हैं। उन्होंने पटना और दिल्ली विश्वविद्यालय के अलावा कई प्रतिष्ठित संस्थाओं और संगोष्ठियों में अनेक शोध आलेख प्रस्तुत किए हैं और व्याख्यान भी दिए हैं। उनके शोध-आलेख और व्याख्यान मिथक और यथार्थ, मौखिक साहित्य, अनुवाद, अंग्रेज़ी उच्चारण, अंग्रेज़ी भाषा शिक्षण इत्यादि महत्त्वपूर्ण विषयों पर केन्द्रित रहे हैं। उन्होंने अध्यापन-शिक्षण-अनुवाद आदि से सम्बन्धित कई कार्यशालाओं में भाग लिया है और कई गतिविधियों का सफल संचालन भी किया है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया और साहित्य अकादेमी की परियोजनाओं के लिए उन्होंने प्रेमचन्द और फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की रचनाओं का अनुवाद भी किया है।

मनु आर्या

मनु आर्या नई दिल्ली स्थित रॉयल नॉर्वेजियन दूतावास में संस्कृति और सार्वजनिक कूटनीति सलाहकार हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज से पत्रकारिता (ऑनर्स) में स्नातक किया है। इसके अलावा उन्होंने ला ट्रोब यूनिवर्सिटी (मेलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया) से मीडिया स्टडीज में डिप्लोमा और राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की है। मनु आर्या विगत 13वर्षों से संस्कृति और सार्वजनिक कूटनीति—विशेषतः साहित्य और भाषा विनिमय—के क्षेत्र में काम कर रही हैं।

हरीश त्रिवेदी

दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग के ख्यातिप्राप्त भूतपूर्व प्रोफेसर हरीश त्रिवेदी शिकागो और लन्दन विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर औरIACLALS (इंडियन एसोसिएशन फॉर कॉमनवेल्थ लिटरेचर एंड लैंग्वेजेज स्टडीज) के भूतपूर्व अध्यक्ष रहे हैं। वे भारतीय साहित्य में औपनिवेशिक विमर्श पर केन्द्रित अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘कॉलोनियल ट्रांजेक्संस : इंग्लिश लिटरेचर इन इंडिया’ के प्रतिष्ठित लेखक हैं। उन्होंने अनेक पुस्तकों का सम्पादन एवं ‘लिटरेचर एंड नेशन : ब्रिटेन एंड इंडिया (1800-1990)’ और ‘पोस्ट कॉलोनियल ट्रांसलेशन : थिएरी एंड प्रैक्टिस’ पुस्तकों का सह-सम्पादन किया है। उन्होंने अमृतराय द्वारा लिखित प्रेमचन्द की जीवनी का अंग्रेज़ी अनुवाद ‘प्रेमचन्द : हिज लाइफ एंड टाइम्स’ नाम से किया है। हरीश त्रिवेदी इस समय भारतीय साहित्य से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण संचयन का सम्पादन कर रहे हैं। इसके अलावा वे विश्व साहित्य के इतिहास लेखन से सम्बन्धित एक विशिष्ट अंतर्राष्ट्रीय परियोजना (स्टॉकहोम) के सम्पादन से भी सम्बद्ध हैं।

श्याम किशोर सहाय

श्याम किशोर सहाय लगभग दो दशकों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने आईबीएन-7, सहारा टीवी और ईटीवी में अपनी सेवाएँ दी हैं और ‘दैनिक जागरण’ तथा ‘हिन्दुस्तान’ जैसे प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों से भी जुड़े रहे हैं। वे भारतीय संस्कृति के गम्भीर अध्येता हैं और विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करते रहे हैं। उन्होंने स्वामी विवेकानंद पर एक संकलन का संपादन किया है और गंगा संरक्षण, द्वादश कुंभ परंपरा के पुनर्जागरण पर उल्लेखनीय शोध-कार्य से संलग्न रहे हैं। श्याम किशोर सहाय स्वामी चिदात्मन वेद विज्ञान शोध संस्थान एवं अन्य अनेक संस्थानों से संबद्ध हैं और संप्रति लोक सभा टीवी में संपादक के रूप में कार्यरत हैं।

विपिन चौधरी

विपिन चौधरी ने साहित्यिक लेखन—विशेषतः कविता और अनुवाद के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। उन्होंने नुक्कड़ और मंचीय नाटकों में भी सफलतम भागीदारी की है और इस समय रेडियो ड्रामा, रंगमंच और फ़िल्मों के लिए लेखन कर रही हैं। उन्होंने रस्किन बॉन्ड के एक कहानी संग्रह का भी अनुवाद किया है। उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियों में ‘नयी सदी के हस्ताक्षर,’ ‘अँधेरे के मध्य से’ और ‘एक बार फिर’ शामिल हैं। ‘ग्रे शेड’ कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन है। उन्हें कई पुरस्कारों से नवाजा गया है जिनमें प्रेरणा पुरस्कार (हरियाणा साहित्य अकादेमी), सावित्रीबाई फुले फेलोशिप अवार्ड (भारतीय दलित साहित्य अकादमी, दिल्ली), प्रेरणा पुरस्कार (भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता) प्रमुख हैं। वर्तमान में वे मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्था ‘मानव अधिकार संघ’ की उपाध्यक्ष और महिला सुरक्षा समिति (हरियाणा) की सदस्य हैं।

अशोक चक्रधर

अशोक चक्रधर हिन्दी के वरिष्ठ कवि, लेखक और मीडियाकर्मी हैं। वे जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर और अध्यक्ष रहे हैं। 29 वर्ष तक काम करने के बाद उन्होंने हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली।2007 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट ऑफ लाइफलॉन्ग लर्निंग (ILLL) में हिन्दी समन्वयक के रूप में जुड़े और 2009 में हिन्दी अकादमी (दिल्ली) के उपाध्यक्ष और मानव संसाधन विकास मन्त्रालय के केन्द्रीय हिन्दी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष नियुक्त हुए। वे एक प्रतिष्ठित हास्य कवि हैं और कविताई की अपनी अनूठी शैली के लिए जाने जाते हैं। उन्हें भारत सरकार द्वारा वर्ष 2014 में पद्मश्री सम्मान और 2016 में उत्तर प्रदेश सरकार का यश भारती सम्मान मिल चुका है।

शैलेश भरतवासी

इलेक्ट्रानिकी एवं संचारिकी में बी. टेक. शैलेश भरतवासी अपने आप को हिंदी काएकमात्र पूर्णकालिक ब्लॉगर कहना पसन्द करते हैं। 2007 में जब उन्होंने ब्लॉगिंग कीदुनिया में कदम रखा तो उस वक्त ऐसी कोई धारणा नहीं थी कि हिंदी ब्लॉगिंग को वे पूर्णकालिक प्रोफ़ेशन का रूप दे सकेंगे। शैलेश भरतवासी ने अपने ब्लॉगिंग प्रकल्प ‘हिंद-युग्म’ के जरिए हिंदी ब्लॉगिंग को एक तरह से री-डिफ़ाइन किया है और ऐसी तमाम संभावनाएँ न केवल तलाशी हैं, बल्कि उसके कमर्शियल वायेबिलिटी की ओर भी पुख्ता कदम रखे हैं। ‘हिन्द युग्म’ के बैनर तले तमाम नायाब और बड़े काम हुए हैं और आगे बहुत सी नई योजनाएँ पाइपलाइन में हैं। हिंदी ब्लॉगिंग के उज्जवल भविष्य के प्रति शैलेश भरतवासी पूरी तरह आश्वस्त हैं और बताते हैं कि आने वाले समय में और भी बहुत से पूर्णकालिक ब्लॉगर आएँगे जो हिन्दी ब्लॉगिंग के जरिए अपनी आजीविका का साधनउपलब्ध कर सकेंगे।

निकोला इडियर

निकोला इडियर ने इतिहास में शोध किया है और यूनिवर्सिटी ऑफ पेरिस सोर्वन से ‘डॉक्टर इन हिस्ट्री ऑफ द आर्ट’ की उपाधि प्राप्त की है। वे पेरिस सोर्वन सेंटर फॉर रिसर्च ऑन द फार ईस्ट में एसोसिएट रिसर्चर हैं। निकोलस एडियर प्रतिष्ठित ‘नुन्स’ पत्रिका के सम्पादक मंडल के सदस्य हैं। उन्हें चीन में फेस्टिवल ऑफ पोएट्री एंड कंटेम्पररी म्यूजिक में गेस्ट ऑफ ऑनर सम्मान मिल चुका है। वे यूनिवर्सिटी ऑफ पेरिस सोवर्न (2004-2010) और यूनिवर्सिटी ऑफ पिकार्डी जूल्स बर्ने (2009-2010) में अध्यापन कर चुके हैं। वर्ष 2008-2010 के दौरान उन्होंने नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ आर्ट हिस्ट्री में अनेक उच्च स्तरीय सम्मेलनों में शिरकत की है। निकोला इडियर शंघाई पर केन्द्रित एक सन्दर्भ ग्रन्थ के लेखक भी हैं जिसका विमोचन 2010 वर्ल्ड एक्सपो के अवसर पर किया गया। चीन स्थित फ्रांसीसी दूतावास में रहते हुए उन्होंने पेरिस पुस्तक मेला (2014) में शंघाई को अतिथि शहर के रूप में आमन्त्रित करने में समन्वयक की भूमिका निभाई। 2014 से वे नई दिल्ली स्थित फ्रेंच इंस्टिट्यूट के बुक ऑफिस से सम्बद्ध हैं और पुस्तकों एवं वैचारिक बहसों में गहरी दिलचस्पी रखते हैं।

संस्थापक न्यासी / Founder Trustee

अशोक वाजपेयी / Ashok Vajpeyi

Ashok Vajpeyi is an Indian poet in Hindi, essayist, literary-cultural critic

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  • Gulzar Saheb is an eminent figure of the Indian literature and film industry. He is well known as a lyricist, author, filmmaker, dialogue-writer, poet and translator.Gulzar

  • Yatindra Mishra is a celebrated poet, writer, who has poetry collections like Agyeya: Jitna Tumhara Sach Hai and Ayodhya Tatha Anya Kavitayein to his name. Yatindra Mishra

  • Anant Vijay is a known name in literature and journalism. He is currently serving as the executive producer at IBN7 News Network and has a vast and varied experience in the field of print and electronic media. Anant Vijay